Tuesday, October 8, 2019

रावण का अंतिम दहन                                                                                                                      

                   हर वर्ष की तरह इस बार फिर नवरात्रि आई और निकल गयी । फिर अगले दिन वो दिन आया जब हम सभी कहने लगे *असत्य पर सत्य की वीजय हो* और ऐसे अनगिनत जयकारे लगने लगे । इसी बीच अब सब कहने लगे है, के अपने अंदर के रावण का दहन करे और ना जाने किन किन अवगुणों का दहन करे ।
ऐसा लगता है के सभीने  यह मान लिया है के अपने अंदर एक रावण किसी अवगुण के रूप में बैठा है और साल में एक बार इसका दहन करना जरूरी है ।

क्या यह उचित नही होगा के हम रावण का दहन करने के मुकाबले एक लक्ष्मण रेखा खिंचे ताकि वह रावण अपनी सीमा से भीतर आ ही ना सके, और हमारे अंदर किसी भी रूप में रावण का अस्तित्व ना हो ?

रामकाल से अब तक यह बात निश्चित हों चुकि है के रावण जब भी लक्ष्मण रेखा देखता है, अपने सीमाओं को जान जाता है, वह कभी भी उन सीमाओं को पार करता नजर नही आता ।
रावण एक व्यक्तित्व था, जीसने छल से फिर सीता माँ का हरण कर ही लिया । लेकिन हम आज जिस रावण की बात करते है, वह एक सगुण परंतु निराकार रावण है, जो अपनी इच्छा से कुछ नही कर सकता । तो फिर इस रावण का और हमारा मिलन होता कैसे है ? 
यह बताने की आवश्यकता नही है के सीता माँ तो उस अवगुणी रावण से अपरिचित अपने अतिथि ऋषि धर्म का पालन कर रही थी और सीमाओं को लांघ गयी । परंतु आज हम उस हर अवगुण को जानते है , परंतु हमारे साथ कोई लक्ष्मण रेखा नही है ।
आज यही सही होगा के हम उस लक्ष्मण रेखा को खिंचे । यह तय है के अवगुणी रावण अपनी सीमाओं को जानकर आगे नही बढ़ेगा । सीता माँ से अलग, आज हम उस रावण को जानते है, और उस रेखा को पार करने से बच सकते है । 

किसी भी रूप का राम बनने की हमारी ना तो तैयारी है, ना ही परिस्तिथि, जो रावण को मार सके । आज बस उस लक्ष्मण रेखा की हम सभी को फिर जरूरत है । और ऐसा हुआ, तो फिर वो दिन दूर नही जब हम दशहरा मनाने के मुकाबले लक्ष्मण रेखा दिवस मनाने लगे और बस वही जाकर रावण का अंतिम दहन होगा ।


जय श्रीराम ।।🙏🙏

अजय खंडेलवाल
मिडिया अमेरिका 

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